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Sunday, 6 July 2014

तुम क्या जानो ...

तुम क्या जानो .......

कुछ भी लिखना
कहाँ है आसान
कलम तो चाहती है
हर वक्त मचलना
शब्दों में भी तो
तड़प होनी चाहिए
बँधने की एक सूत्र में
अहसासों को भी
कुछ तो चाहत हो
बरस जाने की
जज्बात भी तो
चाहें वजूद अपना
किसी कोरे कागज पर
उतारना , तभी तो
कलम का चलना
होगा सार्थक और
बन पड़ेगा कुछ
रोचक सा जिसे
ये दिल चाहता हो
बयान करना तुमसे
और तुम कह देते हो
इसको वाहियात
समय की बर्बादी
तुम क्या जानो
ये तो अब शामिल है
मेरे उन अजीजों में
जो मुझे हरवक्त देते हैं
अहसास मेरे जिंदा होने का
तुम क्या जानो ये सब !!

Wednesday, 2 July 2014

हकीकत हो या सपना ... पीड़ा वही होती है !!

मन अति व्याकुल ... विचारों का गहन मंथन हो रहा अंतर्मन में ... सारे अच्छे बुरे पल चलचित्र की भाँति घूम रहे दिमाग में ... नैन अश्रुपूर्ण और हृदय में अजीब सी पीड़ा ... बाहर से सब सामान्य दिख रहा पर अंतर्मन में भयंकर तुफान ... तभी दूर धुयें से बनती एक परछाई पास और पास और पास आती दिखाई दे रही .. अब इतनी पास कि शक्ल साफ दिख रही है .... ये तो माँ है ... माँ ....माँ .... चिल्लाती उस दिशा में दौड़ती पर माँ जैसे पहले समीप आ रही थी अब उसी तरह धीरे-२ वापस दूर जा रही है ... पकड़ने में असमर्थ पीछे दौड़ती हुई  .. हृदय की पीड़ा कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है और एक तेज चीख निकलती है .. माँ ... रुको ना...... तभी आँख खुल जाती है !
उफ्फ सपना था ये ..... पर हकीकत के कितने करीब लग रहा था... दिल में वही उथल-पुथल.. वही अश्रुपूरित नैन .. हृदय में वही तीक्ष्ण पीड़ा .... वही खोने का अहसास .....

पधारने के लिए धन्यवाद