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Sunday, 13 July 2014

बरसो ना मेघा ....

तने खड़े हैं
गुमसुम बादल
क्यूँ न बरसें

गर्मी से तप्त
भू पर जीव-जंतु
आस लगाये

जमीं का प्यार
समझें न बादल
हुए निष्ठुर

रोते किसान
बिन पानी फसल
न हो बुआई

बच्चे व्याकुल
गर्मी करे बेचैन
खुले हैं स्कूल

*********प्रवीन मलिक**********

5 comments:

  1. बरखा के सभी हाइकू लाजवाब ...

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  2. बेहतरीन हाइकू ....

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  3. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 28 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  4. सुंदर और सार्थक हाइकु… बधाई स्वीकारें

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पधारने के लिए धन्यवाद