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Wednesday, 6 March 2013

मैं और मेरे सपने .......

सपने भी क्या चीज़ हैं सोते-सोते कहाँ-कहाँ की  सैर करा देते हैं,  किस-किस से मिला देते हैं!  काश सपने सच होने लग जाएँ जो हम रात में देखे वो अगले दिन ही पूरा हो जाये ! कितना अच्छा लगे फिर ...

रोज रात को जल्दी से सो जाना और जिससे मिलना हो उसी से सपने में मिल लेना ताकि अगले दिन मुलाक़ात हो जाये !

मुझे रोज ही सपने आते हैं , मेरा बचपन एक जगह नहीं बल्कि घूम घूम कर गुजरा है , कभी यहाँ कभी वहां तो जाहिर सी बात है की मुझे सपने भी ऐसे ही कभी यहाँ कभी वहां के आते रहते हैं ...

आज मुझे स्वपन आया मेरी बुआ जी की ससुराल का ! बुआ जी स्कूल में पढ़ाती थी , प्राथमिक स्कूल की मुख्याध्यापिका थी वो तो मुझे भी अपने साथ ही रखती थी की मैं अछे से अपनी पढाई करूँ !


आज मैंने स्वपन में अपनी बुआ जी का घर देखा जैसे पहले हुआ करता था , आज वैसा नहीं है बहुत बदल गया है लेकिन मुझे वैसा ही दिखा , बुआ जी स्कूल से आई हैं और आते ही अपने काम में लग गयी हैं भैंसों को चारा पानी देने में , अब वो स्कूल की मुख्याध्यापिका नहीं बल्कि एक गृहिणी बन गयी हैं ...

बुआ जी की ड्यूटी उनके ससुराल में ही थी तो बुआ जी सर पर पल्लू लेके सकूल जाती थी और गली में तो पर्दा भी करती थी लेकिन स्कूल जाकर वो मुख्याध्यापिका बन जाती थी , जिसकी वजह से मैं भी गर्व से स्कूल जाती थी की भाई ये तो बुआ का ही स्कूल है तो मुझे तो कोई कुछ नहीं कहेगा ....

हाँ तो मैं सपने पर आती हूँ ...

बुआ जी पहले की तरह जवान दिख रही हैं जिनके हाथ में घर की बागडोर है ! बुआ जी आज की तरह बूढी और असहाय नहीं लग रही हैं ! उनका चेहरा पहले की तरह चमक रहा है आज की तरह झुरियों वाला और मुरझाया सा नहीं लग रहा है ! वहां पर मैं भी एक बच्चे के रूप में हरा समंदर गोपिचंदर गाते हुए खेल रही हूँ ! बुआ जी भैंसों को चारा पानी करके फिर बरामदे में बैठ जाती हैं और कहती हैं की खेल पूरा हो गया हो तो एक कप चाय पिला दे फिर हम बैठ के पढाई करेंगे ( हम पढाई करेंगे मतलब फिर वो हमें पढ़ाएंगे ) और मैं कहती हूँ बुआ जी थोड़ी देर और खेल लूँ , बुआ जी चुपचाप देखती रही और मैं खेलती रही ! कब उन्होंने खुद ही चाय बनाकर पी ली मुझे नहीं पता चला .. मैं तो अपने खेल में व्यस्त थी अपने दोस्तों संग ! बहुत खुश थी मैं सपने में अपने सब दोस्तों के साथ !

सुबह जब मैं उठी तो देखा की ये तो एक ख्वाब  था जो आया और चला गया ! मैंने सुना था की ख्वाब तो जो शाम को याद करो , जो घटना के बारे में शाम को चर्चा करो वही ख्वाब में आ जाती है लेकिन ना तो मैंने शाम को सोने से पहले खुद के बचपन को याद किया और न ही बुआ का कोई जिक्र हुआ ! बुआ का जिक्र तो लगभग ४-५ सालो से नहीं हुआ ! कैसी दिखती हिंगि अब वो ! ५ साल पहले देखा था ! चेहरा मुरझा गया था , बुढ़ापा आ गया था , चेहरे पर झूरियाँ साफ़ झलक रही थी , बाल सफ़ेद हो गए थे और अब पहले से काफी कमजोर भी हो गयी थी ! आज तो वो और भी ज्यादा बूढी हो गयी होंगी !

दिल हुआ बुआ से बात कर लूँ ! लेकिन जैसे ही नंबर डायल किया नोट रीचेबल आ गया ! अब क्या करू बहुत कौतुहल हो रहा है कैसे बात करूँ ! तभी मासी को फ़ोन किया और नम्बर  लेके उनसे बात की काफी टाइम बाद बात की तो बड़ा अच्छा सा फील हो रहा था !

मेरा बेटा मेरे स्वपन की बात सुनकर तुरंत बोला आप तो सबसे स्वपन में ही मिल लेते हो इसीलिए कहीं जाते नहीं ! इसीलिए उन सबसे मिलने आप वहां जाते नहीं हो ! 
आप तो जब मन करता है नाना-नानी से भी मिल लेते हो जबकि वो हैं भी नहीं इस दुनिया में ..
कैसे कहूँ की जब चाहो तब तो नहीं मिल पाती,  हाँ  कभी कभी स्वपन में जरुर मुलाक़ात हो जाती है उनसे बात हो जाती है और फिर अगला दिन उनकी यादों के साथ बहुत अच्छा गुजरता है ! काश जिनको हम शाम को याद करें उनसे ही हम स्वपन में मिलें तो मैं हर रोज अपनी माँ और पापा को याद करके सोऊ ! और सपनो में ही सही उनसे ढेर सारी बातें करूँ ! कुछ उनकी सुनु कुछ अपनी कहूँ ! 

अच्छा ही है की सपने आते हैं , कभी डरावने तो कभी मनभावन ! कभी रुलाते हैं तो कभी हसातें हैं ! पर एक मीठी सी याद छोड़ जाते हैं .......




4 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुतीकरण,आभार.

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  2. sundar arth,bhav,avm sar ko vykt karti prastuti

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  3. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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पधारने के लिए धन्यवाद